युद्ध में घायल होने के बावजूद बिना रुके लड़ने वाले सूबेदार जोगिंदर सिंह के अदम्य साहस को सलाम!

भारतीय सेना में वीरता की अनेकों कहानियाँ सुनने को मिलती हैं. ये सैनिक बिना एक बार सोचे देश की सुरक्षा के लिए अपनी जान की बाज़ी लगाने के लिए तैयार रहते हैं. देश के नागरिक होने के नाते हमें उनके इन साहसिक क़दमों का सम्मान अवश्य करना चाहिए.

सूबेदार जोगिंदर सिंह ऐसे ही अदम्य सैनिक थे जिन्होंने गंभीर रूप से घायल होने के बावजूद भी चीनी सेना का बहादुरी के साथ सामना किया था.

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जोगिंदर सिंह 1936 में प्रथम सिख रेजिमेंट में भर्ती हुए थे और आज़ादी से पहले वह बर्मा (म्यांमार) में कार्यरत थे. 1962 में भारत-चीन युद्ध के दौरान वह आई.बी. चोटी और तवांग में जुड़वा चोटियों पर तैनात 20 सैनिकों की एक पल्टन की अगुवाई कर रहे थे.

यह चोटी, युद्ध के लिहाज़ से भारतीय सेना के लिए बहुत महत्पूर्ण थी, क्योंकि वे वहां से आगे बढ़ने वाले दुश्मनों को मीलों दूर से ही देख सकते थे. इसलिए चीनी सेना के लिए इस पर विजय पाना बहुत आवश्यक हो गया था. इस चोटी पर हार का मतलब था कि दुश्मनों के लिए तवांग पर विजय पाना बहुत आसान हो सकता था.

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सूबेदार जोगिंदर सिंह आसानी से हार मानने वालों में से नहीं थे. वह और उनकी बहादुर पल्टन अपनी जगह पर डटे रहे. उन सबने साथ मिलकर दुश्मन के दो हमलों को नाकामयाब किया था.

क्योंकि चोटी की उंचाई बहुत अधिक थी इसलिए दुश्मनों का भारतीय सेना से छिप पाना बहुत ही मुश्किल था. सूबेदार जोगिंदर सिंह ने इस अवसर का पूरा फायदा उठाया और दुश्मन के अधिक से अधिक सैनिकों को मार डाला. कुछ ही मिनटों के बाद दुश्मन ने दुबारा हमला किया. उनका भी वही हाल हुआ जो कि उनके साथी सैनिकों का हुआ था.

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हालांकि तीसरे हमले के बाद भारतीय सेना के पास गोला-बारूद की कमी होने लगी. बारूद को सेना तक पहुंचाना भी एक मुश्किल काम था. उन्हें कंपनी मुख्यालय में वापस आने के लिए कहा गया था लेकिन सूबेदार जोगिंदर सिंह ने दुश्मनों को रोकने के लिए दृढ़ संकल्प कर लिया था.

उनके निष्ठावान नेतृत्व ने उनकी पल्टन को वहीं डटे रहने और आखिरी सांस तक दुश्मनों से लड़ने के लिए प्रेरित किया. सूबेदार सिंह की जांघ में चोट लगी थी लेकिन वह फ़िर भी मशीन गन से दुश्मनों को रोकने का प्रयास कर रहे थे. भारी नुक्सान के बावजूद भी चीनी सेना आगे बढ़ रही थी.

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सिंह और बाकी बचे लोगों ने हार मानने से इनकार कर दिया था. उन्होंने पराजित होने और युद्ध में बंदी बनाए जाने से पहले अपने बयोनेट से अपनी ओर बढ़ते दुश्मन सेना पर हमला कर दिया. उन्हें दुश्मन द्वारा बंदी बना लिया गया. तिब्बत क्षेत्र, युद्ध में घायल होने के कारण, एक बंदी के रूप में उनका देहांत हो गया.

उन्हें मरणोपरांत, भारत का सर्वोच्च वीरता पुरस्कार “परमवीर चक्र” से सम्मानित किया गया. जब चीनी सेना को इसके बारे में पता चला तो उन्होंने पूरे सैन्य सम्मान के साथ उनकी अस्थियों को भारत को लौटा दिया. भारतीय सेना ने आई.बी. चोटी पर उनके नाम का एक स्मारक बनाकर उनके साहस को सदा के लिए अमर कर दिया.

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