सिंधु घाटी सभ्यता के दौरान भी दिवाली का उतना ही महत्व था जितना आज है लेकिन जश्न मनाने का तरीका आश्चर्यजनक था!

हर साल लाखों करोड़ों लोग दुनिया भर में प्रकाश के इस त्योहार को मनाते हैं। लेकिन क्या आप जानते है कि दिवाली शब्द दीपावली से निकला है, जिसका मतलब रोशनी की एक पंक्ति है? यह त्योहार अंधेरे पर उजाले की जीत का प्रतीक है। इस त्यौहार के सीज़न के दौरान आप पटाखों की आतिशबाजी, बल्ब फ्लैश और लाईटों की झिलमिलाहट देख सकते हैं, लेकिन क्या आप जानते हैं कि सिंधु घाटी सभ्यता (INDUS VALLEY CIVILIZATION) के दौरान यह त्योंहार कैसे मनाया जाता था? और हाँ, उस समय लोग इस त्योंहार को पटाखों से नहीं मानते थे!

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आपको जानकार आश्चर्य होगा कि सिंधु घाटी सभ्यता में, मिट्टी से बने दीपक को जलाकर दिवाली मनाई जाती थी, और उन दिनों मूर्ति के पास रखा जाता था। ये दीपक पर्यावरण के अनुकूल थे, मिटटी के दिए में सरसों के तेल में दीपक जलाने से कई बैक्टीरिया नष्ट होते थे जिससे वातावरण भी शुद्ध रहता था। मिट्टी से लैंप तैयार किए जाते थे जो विघटित (decomposed) होकर फिर से वापस मिट्टी बन जाते थे जिससे  प्रदूषण कम करने में मदद मिलती थी। लेकिन आज के ज़माने में हम इस त्यौहार में प्रदुषण पैदा करने का कारण बन रहे हैं।

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इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि हर साल हम ऐसी आतिशबाजीयां खरीदते हैं जो चीन देश द्वारा उत्पादित होते हैं। इससे बेहतर यह है कि हम भारतीय कलाकारों और कुम्हारों की मदद करने के लिए, भारत में ही बनाए गए मिट्टी के दीपक खरीदकर देश के आर्थिक विकास में अपना योगदान दे सकते हैं।

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