भले ही उनकी संस्कृतियाँ अलग थी लेकिन संगीत ने इन दो दोस्तों को आपस में जोड़ दिया!

वह एक-दूसरे का बहुत सम्मान करते हैं और एक-दूसरे को अपना घनिष्ट मित्र भी बताते हैं लेकिन यह दोनों दो की संस्कृतियों विभिन्न हैं और दोनों की भाषाएँ भी एकदम अलग हैं. फ़िर भी यह दोनों पूरी दुनिया के लिए बेहतरीन संगीत की रचना करते हैं.

लन्दन के येहुदी मेनुहिन (Yehudi Menuhin) विश्व के सबसे बढ़िया वायलिन-वादकों में से एक हैं और रवि शंकर एक भारतीय संगीतकार और सितार-वादक हैं. इन दोनों का संगीत का सफ़र और दोस्ती की कहानी दिल को छू लेने वाली है.

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1952 में एक-दूसरे से पहली बार मिलने वाले इन दोनों मित्रों ने एक-दूसरे के साथ बहुत ही अर्थपूर्ण समय बिताया है, चाहे वह योग के दौरान हो या फ़िर किसी संगीत कॉन्सर्ट के समय.

मेनुहिन और उनकी पत्नी अन्य बड़े संगीतकारों के साथ पहली बार दिल्ली आए थे और शंकर भी वहां सितार-वादन के लिए पहुँचे थे. हालांकि वह एक औपचारिक मुलाक़ात थी लेकिन संगीत के प्रति अपने जुनून की वजह से दोनों की एक-दूसरे के साथ बहुत घुल-मिल गई. मेनुहिन अंतर्राष्ट्रीय संगीत के जानकार थे फ़िर भी उन्होंने शंकर के भारतीय रागों में अपनी रूचि दिखाई. पश्चिमी सभ्यता पूरी तरह से भारतीय संगीत में घुल गई.

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अपने इतने वर्षों की संगीत-यात्रा के दौरान उन दोनों ने एक-दूसरे से बहुत कुछ सीखा है. जबकि मेनुहिन ने शंकर से सीखा है कि संगीत मानव-सार से भी ऊपर है वहीं शंकर ने भी हमेशा मेनुहिन की विनम्रता और आत्म-विश्वास को सराहा है. ऐसे गुण अन्य पश्चिमी संगीतकारों में कम ही देखने को मिलते हैं.

उन दोनों की एक साथ में आई एक बेहतरीन एल्बम थी “वेस्ट मीट्स ईस्ट” (West Meets East).

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अपने जीवन के अंतिम वर्षों में भी शंकर और मेनुहिन ने एक-दूसरे को पूरा सहयोग दिया. उनकी दोस्ती की मिठास उनके संगीत में थी जिसने उन्हें जोड़े रखा था.

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