राजस्थानी गांव की दयालु महिला ने हिरण के बच्चे को जीवित रखने के लिए स्तनपान कराया!

पृथ्वी ने मानव जाति को इतना कुछ आशीष में दिया है लेकिन क्या हम मानव वास्तव में आज एक दूसरे की परवाह करते हैं और प्रकृति के साथ शांति और सद्भाव से रहने का प्रयास करते हैं?

दुनिया के विभिन्न हिस्सों में बसने वाली स्थानीय जनजातियाँ मौजूद है जो प्रकृति के लिए अपनी जिम्मेदारी नहीं भूली हैं, पर हम जो तथाकथित आधुनिक दुनिया के अधिकतर लोग है वे अपने कर्तव्यों को भूल चुके हैं.

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भारत में, राजस्थान की बिश्नोई जनजाति एक ऐसा समुदाय है जिसका जानवरों और प्रकृति के लिए प्यार की कोई तुलना नहीं है. हिरण इस जनजाति का एक पवित्र पशु माना जाता है और इनपर विशेष ध्यान दिया जाता है. बिश्नोई हिरण के बच्चों को अपनी औलाद की तरह मानते हैं और पिछले 500 सालों से यह प्रथा चली आ रही है. हाल ही में, राजस्थान के पाली जिले के नेहदा गांव की एक महिला को हिरण के एक बच्चे को जीवित रखने के लिए स्तनपान कराते देखा गया.

जंगली कुत्तों के एक झुण्ड ने एक मादा हिरण पर हमला किया और उसे बुरी तरह घायल कर दिया. ग्रामीणों ने कुत्तों से मादा हिरण और उसके बच्चे को बचाने की कोशिश की और घायल पशु के बारे में वन विभाग को भी बताया. हालांकि, वन विभाग के अधिकारी मौके पर नहीं पहुंच सके और नतीजतन, मादा हिरण की मृत्यु हो गई. गांव की महिलाओं में से एक ने हिरण के बच्चे की अपने बच्चे की तरह देख-भाल शुरू कर दी. हिरणका बच्चा अब अच्छी तरह से पल रहा है.

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बिश्नोई समुदाय में महिलाएं खुद को शिशु हिरण की मां के रूप में देखती हैं तथा अपने और हिरणके बच्चों के बीच कोई अंतर नहीं करती. न केवल महिलाएं, बल्कि इस समाज के पुरुष भी लावारिस और अनाथ हिरण के बच्चों को अपने परिवार के सदस्यकी तरह मानते हैं.

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